जिसे हम सौंदर्य समझे बैठे हैं, वस्तुतः क्या वह सौंदर्य है या फिर हमारी ही कामवासनाओं का कोई आरोपण है।

जिसे हम सौंदर्य समझे बैठे हैं, वस्तुतः क्या वह सौंदर्य है या फिर हमारी ही कामवासनाओं का कोई आरोपण है। आज हम इसी संबंध में जानेंगे। 


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         उन्नीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक Albert Einstein की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में एक खोज है सापेक्षतावाद  "theory of relativity" जगत की समस्त अनुभूतियां या समस्त इंद्रिय जनित अनुभव सब सापेक्ष हैं, रिलेटिव हैं, संबंधित हैं, संबंध हैं सर्वमान्य सत्य जैसी कोई चीज नहीं है। सत्य हम उसको कहते हैं जो सभी के अनुभव में एक जैसा उतरता हो, जिसका अनुभव प्रत्येक को एक जैसा प्रतीत होता हो जैसे सागर है वह सभी के लिए खारा है कोई भी चखे, कहीं से भी चखे वह उसका गुण है , वह उसका स्वभाव है, वह गुण प्राकृतिक है। 

    लेकिन हम जिसे सुंदर कहते हैं, ब्यूटीफुल कहते हैं, वह सुंदरता उसका प्राकृतिक गुण नहीं है। प्राकृतिक सुंदरता जैसा कुछ भी नहीं है, नेचुरल ब्यूटी का कोई मतलब नहीं होता किसी स्त्री या किसी पुरुष की खूबसूरती उसकी सुंदरता हमारी वासना पर निर्भर है। वह सुंदरता हमारी वासनाओं का आरोपण है। हमारी वासना जितना अधिक या कम प्रगाढ़ होगी, दिखने वाला पुरूष या स्त्री उसी की तुलना में हमें कम या अधिक आकर्षक व़ खूबसूरत दिखाई पड़ेंगे। 

जितनी अधिक मात्रा में वासना होगी, उतनी ही अधिक सुन्दरता का अनुभव होगा। 


     एक स्त्री सभी के लिए सुंदर कभी नहीं हो सकती अपने पति के लिए तो वह असंभव है। यदि कोई स्त्री होना भी चाहे सभी के लिए सुंदर तो उसके लिए एक ही उपाय है कि वह बेसवा हो जाए अन्य भी उपाय हैं लेकिन वे सब अपवाद हैं। उस स्थित में भी सुन्दरता कारण नहीं है कारण वासना ही है। कारण यह है कि उस स्त्री ने अब सभी की वासना को स्वीकार कर लिया उसके द्वार-दरवाजे अब सभी के लिए खुले हैं इसलिए वह सभी के लिए सुंदर है। सुंदर हम उसे ही कहते हैं, जिससे हमें अपेक्षाएं हैं! यदि वह हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है तो वह हमारे लिए सुन्दर कभी नहीं हो सकता। 

     यह जो महिलाओं की खूबसूरती का बखान होता है सारे जगत में, स्त्रियों की खूबसूरती के गीत गाए जाते हैं, कहानियां गढ़ी जाती हैं। इसमें कोई स्त्रियों की सुंदरता का वर्णन नहीं है। यह पुरुष के वासनामय चित्त का ही वर्णन है। मैनें सुना है! एक मनोवैज्ञानिक ने एक प्रयोग किया। इस प्रयोग के लिए उसने अपने ही तीन  विद्यार्थियों का चुना। तीनों युवकों को एक कमरे में बन्द कर दिया गया। उन्हें एक-एक पेंसिल और डायरी दे दी गई। सामने टेबल पर सिनेमा जगत की मशहूर और आकर्षक, खूबसूरत युवतियों की तस्वीरें रखी गईं। उन युवकों से कहा गया, इस डायरी में लिखें, इन खूबसूरत स्त्रियों के बाबत मन में क्या विचार चल रहें हैं। तीनों ने अपने-अपने विचार लिखे। फिर उन्हें दूसरे कमरे में ले जाकर उनकी काम वासना शमित की गयी। पुन: उनसे कहा गया कि अब लिखें क्या ख्याल हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने जो लिखा वह हैरान कर देने वाला था। पहले लिखे गए शब्दों को देखकर लगता था कि किसी अति-कामुक व्यक्तियों द्वारा लिखे गए हैं। और दूसरे लेख को देखकर लगता था कि किसी महात्मा, किसी संत पुरुष के विचार हैं। काम-वासना चित्त की दशा को एक क्षण में परिवर्तित करने की क्षमता रखती है। 

     ख्याल करना जब तुम्हें कोई स्त्री या कोई पुरुष बहुत अधिक सुंदर व आकर्षक लगें तब अपने भीतर टटोलना और खोजना तक्षण ही तुम्हें पता चलेगा कि तुम कामवासना से बहुत अधिक पीड़ित होओगे, तुम उसे पाना चाहते होओगे, तुम उससे गांठ बांधने के लिए तड़प रहे होओगे। कामवासना क्षींण होते ही सारे ख्याल, सारी धारणा तिरोहित हो जाएगी। चूंकि- हमारा यह पुरुष समाज वासना के लिहाज से बहुत ज्यादा स्वस्थ नहीं है।

     इसलिए स्त्रियां बहुत अधिक खूबसूरत व ब्यूटीफुल मालूम पड़ती हैं और पुरुष आकर्षक और ताकतवर दिखाई पड़ते हैं और जब तक स्त्रियां खूबसूरत और सुंदर दिखाई पड़ रहीं हैं। तब तक समझना हमारी वासना प्रगाढ़ है। तब तक महिलाओं के प्रति अपराध जारी रहेंगे, बलात्कार जारी रहेंगे, उनकी हत्याएं होती रहेंगी, कोई व्यवस्था, कोई कानून कारगर सिद्ध होने वाले नहीं है। इसलिए वासना ही मूल है, उसी को नियंत्रित करना है, उसी को संयमित करना है। यदि यह संभव हो पाए तो ही महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया कुछ स्वस्थ हो सकता है। अन्यथा तो सब बचकाना ही सिद्ध होने वाला है। 

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      और महिलाओं को भी, स्त्रियों को भी यह समझना होगा , यह मनोविज्ञान जानना होगा कि जो व्यक्ति, जो पुरुष उनकी खूबसूरती के गीत गा रहा है, उन्हें सुंदर बता रहा है। यह कोई उनकी वास्तविकता का परिचय नहीं दे रहा है वह यह बताने की कोशिश में लगा है कि देखो! मैं वासना से कितना ग्रसित हूं, कितना पीड़ित हूं। मैं तुम्हें अपनी इस वासना को शमन करने के लिए तुम्हें माध्यम बनाना चाहता हूं इसीलिए तुम्हें बरगलाने में लगा हूं। 
   
     लेकिन महिलाएं बड़ी गद-गद होती हैं, वे आनंदित होती हैं। वे इंतजार में रहती हैं कि कोई उनकी खूबसूरती का बखान करे चाहे झूंठ ही सही लेकिन वे अद्वितीय हैं उनके जैसा कोई नहीं है इसकी संतावना , इसका भरोसा , इसका विश्वास जो कराता है वे उस युवक पर प्रसन्नचित्त होती हैं, खुश होती हैं। उनको भी भरोसा आता है, कि वे अद्वितीय हैं, नहीं तो कोई मेरे लिए गीत क्योंकर गायेगा। कौंन कितना सुन्दर है, यह देखने वाले की वासना पर निर्भर है वास्तविकता पर नहीं। जिस दिन वासना के बादल हटेंगें उस दिन ख्याल में आयेगा कि यहां न कोई सुंदर है न असुंदर है उससे पहले समझना जरा मुश्किल मामला है। 



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