"जिस मरनी से जग डरै, मेरो मन आनंद। कब मरिहौं कब पाईहौं, पूरन परमानंद"!!



             "नानक दुखिया सब संसारा"
      यह गुरु नानक देवजी का वचन है।
"नानक दुखिया सब संसारा"।। 


          नानकदेव जी कह रहे हैं दुखिया होना इस संसार का लक्ष्ण है। यह इस संसार का स्वभाव है! हमारी मुसीबत यह है कि हम समझ रहें हैं कि आज दुखिया हैं तो कल सुखिया हो जायेंगे, संघर्ष करते रहो, लड़ते रहो, जूझते रहो कभी न कभी तो सफलता अवश्य ही मिलेगी। सफलता के सूत्र सीखते रहो। सुभाष चंद्रा जैसे लोग यही तो समझा रहे हैं। वे झुठला रहें हैं नानक के वचन को, वे समझा रहें हैं युवाओं को कि कैसे सफलता मिलेगी! सफलता यानी सुखिया होने की कुंजी। और मजा देखो सुभाष चंद्रा को भी अभी वह कुंजी नहीं मिली।

          नहीं! नानक देव यह नहीं कह रहे हैं कि आज दुखिया हो तो कल सुखिया हो जाओगे। वे जगत का लक्षण बता रहे हैं, संसार का स्वभाव बता रहे हैं। जो जिसका लक्षण है, जो जिसका स्वभाव है वह बदलने वाला नहीं है। गर्म होना आग का लक्षण है, शीतलता चंदन का लक्षण है। दुःख संसार का लक्ष्ण है, संसार का स्वभाव है।

          नानक सिर्फ स्मरंण करा रहें हैं, याद दिला रहें हैं, दुखिया है संसार। यहाँ सुखिया होने की कामना ही, चाह ही, इच्छा ही मूढ़ता है! यहाँ सुखिया कोई हुआ ही नहीं, यहाँ सुख ने किसी को छुआ ही नहीं।

          बुद्ध-पुरुषों की यही तो पीड़ा रही है, यही तो चिंता रही है, यही देखकर तो बुद्ध भाग खड़े हुए, इसीलिए तो जीसस का मुंह लटका हुआ है, इसीलिए तो मीरा रोती है। हम भी मुँह लटकाए हैं, हम भी दुखी हैं, पीड़ित हैं,रो रहे हैं! लेकिन हमारे कारण बड़े भिन्न हैं! हम दुखी हैं चाह में, आस में, उम्मीद में। हम दुखी हैं इसलिए कि अभी वह क्षण आया क्यों नहीं, जब मनुष्य सुखी हो जाता है।

          यह मैं तुम्हें स्पष्ट और सच-सच बता रहा हूँ, मनुष्य के रहते, व्यक्ति के रहते वह क्षण कभी नहीं आता।
इसीलिए कबीर ने कहा है।

 ----"जिस मरनी से जग डरै, मेरो मन आनंद।
कब मरिहौं कब पाईहौं, पूरन परमानंद"!!
गोरखनाथ का वचन है।।
          "मरौ हे जोगी मरौ मरन बड़ा है मीठा,
तिस मरनी मरौ जिस मरनी मर गोरख दीठा"
मीरा भी जानती है -सूली बिना सेज संभव नहीं है।

          सुखी होना है तो मरने की हिम्मत जुटाओ, मिटने का साहस बटोरो। तभी सुख संभव है, धन बटोरने से यह न संभव हो सकेगा! दुःख निवारण प्रवचन सुनने से भी यह दुख से नहीं छुटकारा मिलेगा। इन महात्माओं को भी नहीं मिला जो यह समझाते फिरते हैं कि दुख से कैसे छूटें। देखो कितने कार्यक्रम प्रसारित होते हैं, दुःख निवारण के। एक भी आदमी का दुःख निवारण नहीं होता! और दुःख बढ़ता है। यह मैं देख कर कह रहा हूँ, अनुभव से कह रहा हूँ, बहुत ठोंक-बजाकर कह रहा हूँ, खोजबीन करके कह रहा हूँ।

          इसलिए नानक के वचन का अर्थ ठीक से समझ लें। "नानक दुखिया सब संसारा" यह कोई सुखी होने की कुंजी नहीं है! यह वास्तविकता है, यह संसार का लक्ष्ण है।।

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