इसलिए स्त्रियों को ढक दिया गया था। अब स्त्री की तरफ़ से कोई किसी तरह के निमंत्रण की संभावना नहीं है।



       यदि कुछ गलत है, और उसे रोकना है तो दो उपाय हैं। मान लो एक गांव में दो चार व्यक्ति चोर हैं, उन्हें चोरी करने से रोकना है तो दो ही उपायों द्वारा रोका जा सकता है। एक है, कठोरता और दूसरा स्वीकार्य या तो उन्हें कठोरता से बलपूर्वक रोका जाय या फिर उन्हें स्वीकार कर लें और स्यमं भी राजी हो जाएं। समझने के लिए हम इन्हें दो विचारधाराएं भी कह सकते हैं। लेकिन किसी-किसी मुल्क में एक तीसरी विचारधारा भी सक्रिय है उसे हम बाद में समझेंगें वह बनावटी है कहना चाहिए आर्टफिशियल है।

पहली विचारधारा!         

तुलसीदास जी के 'पात्र, काकभुशुंडजी महाराज का कथन है, "काटेंहि पइ कदरी फरह, कोटि जतन कोउ सींच, विनय न मान खगेस सुनुं, डाटेंहि पइ नव नीच"!!58!!

भावार्थ:
          चाहे कोई करोड़ों उपाय करके भी सींचे पर केला तो काटने पर ही फलता है, 'नीच, अनुनय विनय से नहीं मानता वह डांटने-डपटने पर ही समझाता है।

          देखते हैं! हमारे नीति-नियम, दंड-नीतियां सिर्फ  अनुनय-विनय हैं, प्रार्थनाएं हैं, दिशा-निर्देश हैं। व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर हैं, नियम-पालन करने के लिए व्यक्ति स्वतंत्र है, बाध्य नहीं है, विवश नहीं है, भयभीत नहीं है। वह चाहे तो नियम-पालन करे और चाहे तो न भी करे यह कोई बहुत बड़ी गंभीरता का मसला नहीं है। इसीलिए नियमों का उलंघन होता है, इसलिए संविधान का दुरुपयोग होता है। व्यक्ति स्वेछा से अनुशासित नहीं होता, उसे अनुशासन में लाना पड़ता है। इसलिए यह काकभुशुंडजी महाराज का वक्तव्य बड़ा उपयोगी है। लेकिन थोड़ा कट्टरवादी भी मालुम पड़ता है।

          ऐसा लगता है! इस्लामिक नीतियां इसी वक्तव्य पर आधारित हैं। इस्लाम किसी अनुनय-विनय के पक्ष में नहीं है, किसी लीपापोती के समर्थन में नहीं है। वह नीतियों और दंड-नीतियों के मामले जरा भी उदार नहीं है, बहुत कट्टर है। लेकिन वह कट्टरवादी होने के साथ-साथ ही बहुत वैज्ञानिक भी है, बहुत मनोवैज्ञानिक भी है। क्योंकि उसका मानना है कि महिलाओं को यदि पुरुष की अति-वासना से बचाना है तो कठोरता से पेश आना पड़ेगा। यहां मैं यह स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि मैं महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर बात कर रहा हूँ, अन्य मसलों पर नहीं और न ही मैं इस्लाम का समर्थन कर रहा हूं। मैं सिर्फ एक मनोविज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूं।

          आमतौर से दुनिया के तमाम देश इस्लाम की नीतियों व दंड नीतियों को तुगलकी-फरमान, तुगलकी-फरमान कहकर उसका उपहास करते हैं, उसका मजाक उड़ाते हैं। लेकिन यह मजाक का विषय नहीं है। अब जैसे उन्होंने स्त्रियों को पूरी तरह से ढक दिया था, उघड़ने से मना कर दिया था तो यह कोई सर्दी से बचाने के लिए नहीं था और न ही अकारण था। यह भी एक सुरक्षा का ही उपाय है, यह भी एक सुरक्षा ही है पुरुष से बचने के लिए। चूंकि- इस्लाम बहुत कठोर है। इसलिए वह यह भी नहीं चाहेगा कि किसी पुरुष के साथ कोई ज्यादती हो या मामला एक तरफा हो जाए।

          इसलिए स्त्रियों को ढक दिया गया। अब स्त्री की तरफ़ से कोई किसी तरह के निमंत्रण की संभावना नहीं है, स्त्री की तरफ़ से कोई बुलावे का उपाय नहीं है। इसके बाद भी यदि कोई पुरुष स्त्री पर हमला करता है तो वह निश्चित ही कठोर दंड का भागी है और उसे किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाएगा और ना ही उसके प्रति कोई सहानुभूति ही प्रकट की जाएगी। यह इस्लाम की नीति है, यह कठोरता है, यह उनकी विचारधारा है, वे इस विचारधारा से संतुष्ट हैं, राजी हैं, सहमत हैं!

          इसलिए यह जानकर आश्चर्य होगा कि अन्य भी जो अविवाहित युवतियां हैं, यह आवश्यक नहीं है कि वे भी इस्लाम से प्रभावित हैं या उन्हें पता है इसके बाबत। वे भी जब घर से बाहर निकलेंगी तो मुंह पर कोई कपड़ा या दुपट्टा लपेट लेंगी वे भी अपने चेहरे को ढक लेंगी। जो विवाहिता हैं उनके लिए घूंघट है। क्योंकि हमारे सारे संबंध सापेक्ष हैं। यह जरूरी नहीं है कि मैं तुम्हें पसंद करता हूँ तो तुम भी मुझे पसंद करो। स्त्री का चेहरा देख कर ही पुरुष के मन में, पुरुष के जहन में उस स्त्री के प्रति हजार तरह के विचार, हजार तरह की कामनाएं, वासनाएं, इच्छाएं, निर्मित होने लगती हैं। अंतर्मन के किसी अंजान जगत में उस पुरुष के काम-संबंध उस स्त्री के साथ निर्मित हो जाते हैं!

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          और यदि किसी व्यक्ति के अन्तर-मन के जगत में किसी स्त्री के साथ संबंध स्थापित हो गए हों तो वह जबतक भौतिक जगत में भी उस स्त्री के साथ संबंध नहीं निर्मित कर लेगा तबतक वह वेचैनी ही अनुभव करता रहेगा। और उस स्त्री के पीछे कामधंधा त्याग कर लगा रहेगा, उसे प्रताड़ित करता रहेगा है। और उस स्त्री के समझ के परे है कि मामला क्या है? क्यों यह मेरे पीछे लगा है अकारण ही! यह जो एक-तरफा प्रेमियों की मुसीबतें हैं, यह जो एक तरफा प्रेम में हत्याएं होती हैं, महिलाओं के गले काट दिये जाते हैं यह सब इसी तथ्य का परिणाम है।

          मेरे ख्याल से इन्हीं सब उपद्रवों से बचने के लिए, इन्हीं सब अपराधों से बचने के लिए, यह घूँघट-प्रथा का चलन अस्तित्व में आया होगा। लेकिन पुरुष के लिए इससे बड़ी अपमानजनक बात और क्या होगी कि स्त्री को मुँह ढककर चलना पड़ रहा है, पुरुष से स्वयं को बचाना पड़ रहा है।

दूसरी विचारधारा के भी देश हैं, 

          जैसे पश्चिमी मुल्क हैं वे सर्वस्वीकार्य की भावना से सहमत हैं। वे स्त्री को ढकते नहीं हैं उघाड़ते हैं, नग्न करते हैं। वे प्राकिृत के पक्ष में खड़े हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति को अज्ञात में, अन्तरमन में, चोरी-छुपे, अंधेरे में, एकांत में करना ही पड़ता है, उसे बाहर, बाजार में, खुले में करने में क्या हर्जा है। वे इस विचारधारा से संतुष्ट हैं, सहमत हैं, राजी हैं।

          लेकिन जैसा मैंने कहा किसी-किसी मुल्क में एक तीसरी विचारधारा भी सक्रिय है। हमारी गड़ना उन्हीं मुल्कों में आती है। हमारे लिए वे दोनों ही बेमानी हैं। काकभुशुंडजी महाराज हमें तुगलगी लगते हैं, और सर्व-स्वीकार्य की भावना हमारी सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ है तो यह मुल्क तीसरी विचारधारा से संतुष्ट है। ऊपर-ऊपर हम चिल्लाते भी हैं, शोरगुल भी मचाते हैं, महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी भी ले लेते हैं, ब्रम्हचर्य का व्रत भी ले लेते हैं। और भीतर, एकांत में, अंधेरे में सब गोरखधंधा भी चालू रखते हैं। सो परिणाम तुम स्पष्ट देख सकते हो यहां सब चलता है। यहां बाप बेटी से रेप कर पाता है, ससुर बहू पर अत्याचार कर पाता है, शिक्षक छात्रा का बलात्कार कर लेता और महत्मा शिष्या के कपड़े उतार पाता और कुछ भी नहीं होता। क्योंकि यह मुल्क इस विचारधारा से संतुष्ट है, सहमत है, राजी है।

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