तमाम कुवांरी लड़कियां वहां कई दिनों से कैद थीं।एक दर्जन से भी ज्यादा कुवांरी लड़कियां.......!

 उसे सनक कहें या लत, जुनून कहें या भ्रांति यह कैसा पागल-भाव है। 


          यह जिस व्यक्ति पर हावी होता है उसे निश्चित ही हैवानियत के असीम तक ले जाए बिना नहीं रुकता। इसी पागल-भाव ने सन 1561 में, इंग्लैंड में जन्मी हैवानियत की मूरत, शाकिनी, डाकिनी एलिजाबेथ बाथरी को अपना शिकार बनाया। जब एलिजाबेथ केवल 15 वर्ष की थी तभी उसका विवाह कर दिया गया। उसका पति एक शाही घराने की सेना में बहुत बड़े ओहदे पर काम करता था, लेकिन कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। करीब 45 वर्ष की उम्र में उसने दूसरा विवाह किया उसके इस दूसरे पति का नाम था 'काउंट मैथियास, वह एक शाही राजघराने से था। किंतु दुर्भाग्य से काउंट भी मृत्यु को प्राप्त हो गया। पति की मर्त्यु के बाद एलिजाबेथ अकेली पड़ गई।

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           आप जानते हैं, अकेलापन कटता नहीं, काटता है, कचोटता है, भयभीत करता है। अकेले कोई भी रहना पसंद नहीं करता। एक दफे तो उसने मन बनाया कि तीसरा विवाह कर ले, किंतु अब उसके चेहरे पर झाइयां पड़ने लगी थीं, इससे वह बहुत परेशान थी। स्वभावत: वह किसी भी सूरत में बुढ़ी नहीं होना चाहती थी। इस संबंध में उसने जांच पड़ताल की तो कुछ तांत्रिकों ने उसे बताया कि कुंवारी कन्याओं का रक्त उपयोग करने से इस बुढ़ापे को रोका जा सकता है। यही वह घड़ी थी जब उसके जहन पर 'सनक, सवार हुई। और ऐसी सवार हुई कि उसने एक के बाद एक कुंवारी लड़कियों को कत्ल करना शुरूं कर दिया। शुरुआंत उसने अपने ही महल में काम करने वाली एक नौकरानी से की, इस काम के लिए उसने महल के ही तहखाने को चुना। एक बड़े बर्तन पर गर्दन रखकर बड़ी बेरहमी से उसने नौकरानी का कत्ल कर दिया। फिर नग्न होकर उस बर्तन का खून अपने सिर पर उड़ेल लिया। इससे उसको अपने शरीर पर कुछ चमक का अहसास हुआ। हालांकि यह सिर्फ उसकी भ्रांति थी।

           फिर तो वह रोज सिलसिलेवार इसी बहसी अंदाज में कुँवारी लड़कियों को तहखाने में ला-लाकर कत्ल करती रही और उनके खून से स्नान करती रही। आस-पड़ोस के गांवों की तमाम लड़कियां एक-एक कर नदारद होने लगीं। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि ये लड़कियां कहां जा रही हैं। कुछ खास एलिजाबेथ बाथरी के करीबी जानते थे कि यह सभी लड़कियां बाथरी के वहम का शिकार बन रहीं हैं।

ऐसे हुआ हैवानियत का पर्दाफाश। 

           रात करीब बारह बजे, महल की एक नौकरानी 'मारिया, अपने मंगेतर के इंतजार में जाग रही थी। उसका प्रेमी भी उसी महल में काम करता था। अचानक मारिया ने किसी के कदमों की आहट सुनी, उसने दरवाजे के पीछे से छुपकर देखा तो वह एलिजाबेथ थी। लेकिन इतनी रात को कहाँ जा रही, अचानक उसके मन में यह प्रश्न कौंधा, साहस बटोरकर दबे पांव मारिया उसके पीछे-पीछे चलने लगी। एलिजाबेथ तेजी से तहखाने की ओर बढ़ी जा रही थी। तहखाने के दरवाजे पर वह थोड़ी देर ठिठकी, इधर-उधर देखा और फिर भीतर चली गई, दरवाजा बन्द हो गया। मारिया दरवाजे के पास छुप गयी।

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          थोड़ी देर बाद मारिया को लड़कियों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनाई पड़ीं, ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें बड़ी बेरहमी से पीटा जा रहा है। लेकिन अचानक ही सब शांत हो गया। करीब डेढ़ घंटे बाद तहखाने का दरवाजा खुला। एलिजाबेथ बाहर निकली तो वह खून से लतपत कपड़े में लिपटी हुई थी, उसके बाल खुले थे, उसके बालों से खून टपक रहा था। मारिया ने अपनी आंखों के सामने उसे इस कपडे़ से अपने बदन को पोंछते हुए देखा।
          इस घटना से मारिया को इतना बड़ा सदमा पहुंचा कि वह काफी दिनों तक कुछ बोल ही नहीं पायी और बिमार हो गई। हालांकि उसका प्रेमी मारिया को लेकर महल से दूर चला गया। वहां जाकर उसने उसका इलाज करवाया।

           उन दोनों के जाने के करीब छ: माह बाद महल की दीवार के पीछे एक लड़की की लाश मिली, लाश की जांच पड़ताल करने पर पता चला कि शरीर में एक भी बूंद खून नहीं है। बात राजा तक पहुंची, राजा ने उच्चतम स्तर पर जांच पड़ताल करवाई। महल का वह तहखाना भी खोज लिया गया। सैनिक जब तहखाने के अन्दर प्रवेश हुए तो वहां का भयानक नजारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए। एक दर्जन से भी ज्यादा कुवांरी लड़कियां वहां कई दिनों से भूखी प्यासी जंजीरों में जकड़ी हुई थीं। तहखाने की दीवारें खून से लाल थीं, तमाम लाशें इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं, उनसे बदबू आ रही थी। वहां एक बड़ा 'टब, भी मिला जिसमें खून के लोथड़े चिपके थे। बाद में पता चला कि वह इसी टब में बैठकर नहाती थी।

         सैनिकों ने उन लड़कियों को आजाद कराया और एलिजाबेथ व उसके सहयोगियों पर बिना मुकदमा चलाए, सन सोलह सौ दस में बीच चौराहे पर फांसी पर लटका दिया गया। और उसके जिस्म को चील-कव्वों के हवाले कर दिया गया।

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