आज भी कायम है अशुरक्षा की भावना।

        समय की इस अनंत धारा में, एक समय ऐसा भी गुजर गया है। जब सिर्फ राजाओं का राजशाही शासन ही हुआ करता था। प्रजा राजा के अधीन हुआ करती थी। उन राजाओं की अपनी फौज होती थी, अपने सिपाही होते थे। ये सिपाही प्रजा के साथ मनमाना व्यवहार करते थे। पुरुषों पर जुल्म ढाते और महिलाओं पर अत्याचार करते थे। और जब कोई प्रजा का 'जन' इन राजाओं के दरबार में इंसाफ के लिए जाता। तो जो राजा न्याय प्रिय होता वह अपनी प्रजा के साथ न्याय करता। और उन  सिपाहियों को भी दंडित करता  जिन्होंने प्रजा के साथ दुर्व्यवहार किया था।


       लेकिन जो राजा स्वयं ही अपराधिक प्रवृति का होता, वह प्रजा के साथ न्याय करने के बजाय उन पर कोडे़ बरसाता और उन सिपाहियों को सम्मानित भी करता जिन्होंने प्रजा को सताया था।

          कुदरत के संवैधानिक नियमों ने राजाओं को मिटा दिया, रजवाड़े समाप्त हो गए, रियासते विदा हो गई, वक्त बदल गया, नाम बदल गए, राजाओं के सिंहासन पर मंत्रियों का, नेताओं का कब्जा हो गया। घुड़सवार सिपाहियों की जगह पुलिस के जवान तैनात हो गए। रजवाड़ों की जगह परिवारवाद व वंशवाद हावी हो गया, रियासताें को सियासतों ने कुचल डाला। सब बदल गया। लेकिन इस सब बदलाहट के बावजूद भी वह तानाशाही मानसिकता नहीं बदली। वह एक दूसरे को दबा देने व कुचल देने का, एक दूसरे के अधिकारों को लूट-खसोट लेने का, छीन झपट लेने का पागल भाव नहीं बदला।

       जिन महिलाओं के साथ बर्बरता हुई है, जिन लोगों के साथ अत्याचार हुआ है, जिन असहाय और कमजोर लोगों की जमीनों पर कब्जे हुए हैं, जिनके साथ लूट खसोट और छीनाझपटी हुई है, उनके लिए तुर्कों, मंगोलों, व मुगलों के शासन में और आज के इस जनता के शासन में कोई विशेष भेद नहीं है। भेद सिर्फ इतना ही है कि मुगलों के शासन में पुरुषों पर जो जुल्म होते थे, महिलाओं पर जो अत्याचार होते थे उनको सिर्फ वही लोग अंजाम देते थे जिनकी हुकूमत होती थी। अन्य कोई साधारण 'जन' किसी महिला के साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार नहीं कर सकता था। नादिरशाह के विषय में तो कहा जाता है कि यदि उसे खबर लग जाती थी कि अमुक व्यक्ति ने किसी महिला के साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, या छेड़छाड़ की है, तो वह फौरन ही उसकी गर्दन धड़ से अलग करवा देता था। लेकिन स्वयं नादिरशाह और उसके सिपाही महिलाओं के साथ मनमाने तरीके से व्यवहार किया करते थे। इससे महिलाओं के बीच सदा भय की स्थिति बनी रहती थी, लेकिन एक तरह की निश्चिंतता का भाव भी कायम रहता था। क्योंकि किसी अन्य से कोई खतरे का प्रश्न ही नहीं था। किसी गुंडे-गुरगे का या किसी दबंग का कोई सवाल ही नहीं था। यदि कोई चीख किसी स्त्री की कहीं सुनाई भी पड़ती तो यह प्रश्न नहीं खड़ा होता था कि इस चीख के पीछे कारण क्या है, क्योंकि सभी जानते थे अपराधी के विषय में कि वह कौन है।

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        आज सवाल खड़ा होता है। आज सब जांच-पड़ताल करनी पड़ती है। आज सीबीआई की मांग उठती है। क्योंकि कोई नहीं जानता अपराधी कौन है? आज सब जगह नादिरशाह और चंगेज खान जैसे अपराधी घूम रहे हैं, जिनकी जानकारी ना तो हुक्मरानों को है और ना ही महिलाओं को। आज की स्थिति में महिलाएं न तो भयमुक्त हैं और ना ही निश्चिंत, उसका कारण यही है कि आज जो अपराध है वह एक तरह से लिक्विड हो गया है, तरल हो गया है, घुल मिल गया है। पता चलना मुश्किल है। कौन बेईमान है? कौन इमानदार है? कौन रक्षक है? कौन भक्षक है? कौन चोर है? कौन सिपाही है।

       जैसे व्यक्तियों के विषय में नहीं कहा जा सकता। वैसे ही स्थानों के बारे में भी सुनिश्चित करना मुश्किल है कि कौन से स्थान, संस्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। कहां भयमुक्त वातावरण है। सब जगह से खबरें आती रहीं हैं। घरों से , स्कूलों से , पुलिस थानों से, अस्पतालों से, ऐसी कोई भी तो जगह नहीं है, ऐसा कोई भी तो संस्थान नहीं है जहां हम छाती ठोक कर कह सकें कि यहां महिलाओं को खतरा नहीं है। लेकिन अपनी इस नाकामी को छुपाने के लिए जैसे कुछ मंत्री , नेता, धार्मिक गुरु और खाप पंचायतों के मुखिया बेहूदे और उलूलजुलूल फरमान व बयान बाजी करते रहे हैं वैसे ही हमारी सरकार भी यह सिद्ध करने में पीछे नहीं है कि वह भी इन नेताओं, मंत्रियों व धर्मगुरुओं से किसी भी स्तर पर पीछे नहीं है।

      अभी एक प्रचार चल रहा है टेलीविजन और नाटकों के माध्यम से स्वच्छता अभियान को लेकर उसका उद्देश्य है कि घर में ही शौचालय बनवाए। लेकिन क्यों बनवाएं? इसको बताने के लिए उन्होंने यह दलील पेश की है कि घर की महिलाएं बाहर जाती हैं शौच के लिए, पीछे से गांव के दबंग उनसे छेड़छाड़ करने पहुंच जाते हैं। किसी तरह महिलाएं हाथापाई करके स्वयं को बचा पाती हैं और भागकर घर वालों को आपबीती बताती हैं। घर वाले इस घटना की शिकायत लेकर गांव के मुखिया के पास जाते हैं। गांव का मुखिया उन्हें सलाह देता है कि देखो! घर में शौचालय बनवाना कितना आवश्यक है। घर में ही शौचालय बनवाएंं और बहन बेटियों की इज्जत बचाएं। उन्हें बाहर ना जाने दें। क्या मतलब हुआ इसका उन दबंगों का क्या हुआ। यह अब घर में घुसकर हमला करने वाला है। फिर क्या करोगे?

       इस प्रचार-प्रसार में भी दोषी महिलाओं को ही ठहराया गया है, कि क्यों जाती हैं बाहर। बाहर जाएंगी तो दबंग पकड़ेगा। अर्थात! गांव में यदि जंगली जानवर घुस गए हैं, और उनसे यदि बचना है, तो दरवाजा बंद करके बैठे रहो। लोगों की दलील है कि हम जंगली जानवर का तो कुछ भी नहीं कर सकते। तुम्हें अगर बचना है तो बाहर ही न निकलो।

       ऐसे व्यर्थ के तर्कों व दावों के तामझाम में उलझने से बेहतर है की भीतरी कारणों की खोज बीन की जाए और जब कारण स्पष्ट हो जाएं तब उनके उपाय खोजे जाएं। यह कोई पहला मुल्क नहीं है जहां महिलाओं के साथ अपराध हो रहे हैं , रेप हो रहे हैं , दुनिया में और भी मुल्क हैं। लेकिन जिनके पास समझ है, उन्होंने कभी ऐसे व्यर्थ के आश्वासनों से महिलाओं को बरगलाने की कोशिश नहीं की है। उन्होंने सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक स्तर पर खोजबीन करके कारणों को जानने का प्रयत्न किया है। इलाज शुरू करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि बीमारी क्या है। तभी उसका निदान संभव है। हमें मालूम नहीं है की महिलाओं के साथ अपराध क्यों हो रहे हैं, अत्याचार क्यों हो रहे हैं। इसलिए हम कभी महिलाओं के पहनावे को दोष देते हैं, और कभी उनके रहन-सहन पर उंगली उठाते हैं। परिणाम यह होता है कि तमाम तर्कों और दावों के बावजूद भी महिलाओं के प्रति अपराध हाेते हैं और अत्याचार बढ़ते जाते हैं।..


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