नासमझी की वजह से होती हैं, तमाम निरीह बेजुबानों की हत्याएं!



https://www.paltuji.com
practical life

   -----हजरत 'अब्राहिम' की नासमझी की वजह से होती हैं, तमाम निरीह बेजुबानों की हत्याएं!



     कथा है! यदि जरूरत पड़े तो मुसलमानों को अपनी महबूब चीज को भी अल्लाह की राह में कुर्बान करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन वह महबूब चीज क्या है। यह न हजरत इब्राहिम को पता था और न ही उनके पीछे चलने वाले उनके अनुयाइयों को! और यह पता भी नहीं चल सकता। क्योंकि मेरे लिए जो चीज प्यारी है, वह आवश्यक नहीं है कि आपके लिए भी प्यारी होगी। आपकी पत्नी जितना दूसरों के लिए प्यारी हो सकती है उतना वह आपके लिए कभी भी नहीं हो सकती। 

   दरअसल प्यारा होना भी हमारी अपेक्षा और आसक्ति का ही परिणाम है। जिसके प्रति हम बहुत अधिक आसक्ति व अपेक्षा से भरे होते हैं वह हमारे लिए प्यारा हो जाता है, महबूब हो जाता है। और आसक्ति भी अपेक्षा से ही पैदा होती है। आसक्ति कहें, मोह कहें, महबूब कहें, उन सभी का श्रोत एक ही है 'अपेक्षा, अगर मेरे पुत्र से मेरी अपेक्षाएँ अधिक होंगी तो वह मेरे लिए बहुत प्रिय हो जायेगा। और यदि वह कल मेरी अपेक्षाओं के प्रतिकूल हो जाता है, जो-जो अपेक्षाएँ, जो-जो उम्मीदें मैंनें उससे बांधीं थी वे सब टूट जांए तो वह फिर हमारे लिए प्यारा नहीं रह जाएगा, फिर वह हमारा परम शत्रु हो जायेगा। 

      तो यह जो प्यारा होना है, यह बहुत व्यक्तिगत मामला है कहना चाहिए बहुत पर्सनल है। हजरत मोहम्मद को जो प्यारा था, वही अल्लाह को भी प्यारा होगा यह जरूरी नहीं है। इसलिए इस प्यारे शब्द को ठीक से समझ लेंगें तो आगे इस कहानी को समझना आसान हो जायेगा। और यह जो मैं कह रहा हूँ, यह मनुष्य का मनोविज्ञान है, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, अब आगे की कथा पर आते हैं। 

     हजरत इब्राहिम जो अल्लाह के एक महबूब पैगंबर थे, उन्होंने एक दिन ख्वाब में देखा कि अल्लाह उन से कह रहे हैं कि अपनी सबसे महबूब चीज को उनकी राह में कुर्बान करो। इब्राहिम के पास सैकड़ों ऊंट थे, उन्होंने वे सारे ऊंट कटवा दिए! सोचा कि अल्लाह खुश हो गया, लेकिन अल्लाह खुश नहीं हुए, अल्लाह ने पुनः अब्राहिम को फटकार लगाई और कहा कि अपनी सबसे प्रिय वस्तु को कुर्बान कर! इस बार अब्राहिम ने अपनी सारी भेड़ें मरवा दीं! परमेश्वर ने उन्हें भी नहीं स्वीकारा!

   ऐसे ही कहानी चलती है, अब्राहिम कुर्बान करते चलते हैं और परमेश्वर नकारता हुआ चलता है! अंत में उन्होंने अपने एकमात्र बेटे हजरत युसूफ को ही अल्लाह की राह में कुर्बान करने का फैसला कर लिया। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद भी छूरी युसूफ के गले को नहीं काट सकी। अब मुस्लमांन इसे ही इल्हाम समझते हैं! लेकिन यह कोई इल्हाम नहीं है! छूरी न चलने का कारण यही था कि अब भी हजरत अब्राहिम द्वारा नासमझी का ही प्रदर्शन हो रहा था! इसलिए अल्लाह ने उसे भी रोका, वह गला नहीं कट सका और बाप के हांथों बेटे का कत्ल होता देखे 'खुदा' इतना तो कठोर भी नहीं हो सकता। 

      मैं समझता हूँ कि यदि उस दिन वह छूरी चल गयी होती तो शायद आज हम भेंड़-बकरियों की जगह अपने बच्चों की गर्दनें काट रहे होते। क्योंकि हम तो यही समझते कि खुदा ने नवासों की बली स्वीकार कर ली है। इसलिए अगर वह छूरी नहीं चली तो इसमें कोई इल्हाम नहीं है और न ही कोई चमत्कार है यह खुदा के लिए बिल्कुल स्वाभाविक है। खुदा अगर है तो वह कभी भी किसी के भी प्रांण नहीं लेना चाहेगा, वह चाहे मेमना हो या इंसान इसीलिए वह खुदा है, और जब हम गीत गाते हैं कि अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी तब हमें पता नहीं होता कि हम अल्लाह का अपमान कर रहे हैं, लेकिन जैसे हजरत मोहम्मद नहीं समझे वैसे ही हम भी नहीं समझ पाए कि महबूब चीज़ क्या है?

सबसे ज्यादा महबूब और प्यारी चीज क्या है? 

      मनुष्य ही नहीं, प्रत्येक जीव के लिए उसकी महबूब चीज उसका स्वयं का होना है, उसका 'मैं' है, उसका अहंकार है, वह स्वयं को खोना नहीं चाहता, वह अपने अहंकार को बचाना चाहता है, वह कहता तो है! जानवर प्यारे हैं, पत्नी प्यारी है, बच्चे प्यारे हैं, जमीन जायजाद प्यारी है!

     लेकिन जब संकट अपने प्राणों पर आ जाए तो सब प्यारी चीजें नदारद हो जाती हैं और अपने प्रांण ही सबसे महबूब हो जाते हैं, प्यारे हो जाते हैं, प्रिय हो जाते हैं, यही बात परमेश्वर बार-बार की कुर्बानियों को इनकार कर के बताने की कोशिश कर रहा है! लेकिन हजरत इब्राहिम समझने को राजी ही नहीं हैं! हम कहते तो हैं की पन्नाधाय ने त्याग कर दिया अपने पुत्र को मरवा कर, लेकिन यह सब त्याग व्यर्थ हैं। असली त्याग यह है कि मनुष्य अपने अहंकार को कुर्बान कर दें, मैं की गरदन पर छूरी चला दे!

    और अगर यह छूरी इब्राहिम अपने नवासे की गरदन पर चलाने के बजाय अपनी गरदन पर चलाते तो मुझे यकीन है, अल्लाह उन्हें दौड़कर गले लगा लेता! अपनी नासमझी की वजह से वे अल्लाह के रहम से दूर हो गये! और अपने पीछे छोड़ गये कभी न चुप होने वाली निरीह बेजुबान जानवरों की चीखें, उनकी तड़प, उनके आंसू!!

     ऐ, खुदा, मैं' प्रार्थना करता हूं! एक बार फिर से, ख्वाब में आकर कह दे, मैं इन कुर्बानियों से राजी नहीं हूं! शायद ! यह जो चल रहा है, अनवरत् नारकीय सिलसिला बेजुबानों का लहू पीने का, और उनका मांस खाने का यह थम जाए!



https://www.paltuji.com
practical life

https://www.paltuji.com/


Previous
Next Post »